मेरे मन के मंदिर में मूरत है घनश्याम की mere mann ke mandir mei murat hai ghanshyam ki
मेरे मन के मंदिर में मूरत है घनश्याम की
मेरी सांस सांस में धुन है उसी के नाम की
मेरे मन के मंदिर में मूरत है घनश्याम की
कितना दयालु है बंसी वाला
बिन मांगे दिया मुझको उजाला
उज्जवल है मेरे सांझ सकारे
जब से मैं आई श्याम के द्वारे
देखी मन की आंखों से शोभा धाम की
मेरे मन के मंदिर में मूरत है घनश्याम की
चरणों की मैं धूल उठाऊं
धूल को माथे तिलक लगाऊं
श्याम की भक्ति श्याम की पूजा
और मुझे कोई काम ना दूजा
ना सुध है विश्राम की ना सुध स्नान की
मेरे मन के मंदिर में मूरत है घनश्याम की
मेरी सांससांस में धुन है उसी के नाम की
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