आके जाता रहा जाके आता रहा यूंही चक्कर चौरासी के खाता रहा
आके जाता रहा जाके आता रहा
यूंही चक्कर चौरासी के खाता रहा
इसी आवागमन के उलट फेर में
वक्त हीरा ये हाथों से गंवाता रहा
खेल में बचपन की कहानी गई
जोश में होश खोकर जवानी गई
बाद में फिर बूढ़ा होकर जिया
तेल बिन दिया टिमटिमाता रहा
वक्त हीरा ये हाथों से गंवाता रहा
जब उम्र का सफर खत्म होने लगा
पहुंच मंजिल के नजदीक रोने लगा
फिर. कहा. पगले खुद. ही तूने
यूँ ही स्वाशों का धन लुटाता रहा
वक्त हीरा ये हाथों से गंवाता रहा
घर के साथी हाथी घोड़े यहां
और जो नोटों के बंडल जोड़े यहां
आखिर जब ये सामान छोड़े यहां
देख मन ही मन तिलमिलाता रहा
वक्त हीरा ये हाथों से गंवाता रहा
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