आज की सुबह मुझे सबको बस यही पैगाम. देना है
आज की सुबह मुझे सबको
बस यही पैगाम. देना है
फूल बनके खिले हैं जो हम
धूल में एक दिन मिल जाना है
काहे की फिर मोह माया जब
साथ कुछ नहीं ले जाना है
सत कर्मों से जो पुण्य मिलेगा
सिर्फ वही तो साथ जाना है
चाहे कमालो कितनी भी दौलत
बस दो रोटी का ही निवाला है
घूमलो आज महंगी कारों में
अंतिम यात्रा अर्थी पर जाना है
आज मिले हैं मखमली बिछोने
अंत में तो लकड़ी पर ही सोना है
छूट जाएंगे सारे रिश्ते नाते
आंखों से आंसू बन बह जाना है
प्यार से जीत लो सबके दिलों को
कल उन्ही दिलोंमें याद रहजाना है
फूल बनके खिले हैं जो हम
धूल में एक दिन मिल जाना है
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