धन के भूखे नही हैं मेरे श्यामजी
धन के भूखे नही हैं मेरे श्यामजी
भाव श्रद्धा सुमन और भजन चाहिये
देंगें दरशन ज़रुर तुम्हें एक दिन
उनसे मिलने की दिल में लगन चाहिये
छोड़ अपना सिंघासन वो दौडे चले
फिर सुदामा लगाया था अपने गले
उनके चरणो मैं सब कुछ समर्पित करो
प्रेम से सुमिरन और भजन चाहिये
भेंट केवट से कर राम हर्षाये थे
बेर भिलनी के खाने चले आये थे
एेसा दुनिया मैं देव दयालू नही
उनके चरणो मैं करना नमन चाहिये
ढ़ोगियों के भवन श्याम ज़ाते नही
बिना भाव वो भोजन खाते नही
रहते भक्तों के वश में सदा श्यामजी
हर सुबह शाम करना नमन चाहिये
लेते भक्तों के हित श्याम अबतारजी
छोड़ कर देख अभिमान इंसान तू
बोलने सबसे मीठे बचन चाहिये
भाव श्रद्धा सुमन और भजन चाहिये
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