मंगल करो अमंगल हारी गणपति देवा
मंगल करो अमंगल हारी गणपति देवा
भक्त तुम्हारे तुमसे मांगे सच्ची सेवा
मंगल करो अमंगल हारी गणपति देवा
प्रथम वंदना तेरी होती
तुमसे ग्यान की जलती ज्योती
सीप में भरते हो तुम मोती
कर्म की तुमसे बढती होती
मंगल करो अमंगलहारी गणपति देवा
भक्त तुम्हारे तुमसे मांगे सच्ची सेवा
कर में सोहे कमल का फूल
फरसा काटे पाप का मूल
हम दाता तेरे चरणो की धूल
माफ करो जीवन की भूल
मंगल करो अमंगलहारी गणपति देवा
भक्त तुम्हारे तुमसे मांगे सच्ची सेवा
सखा तुम्हें अपना कहते हैं
याद में तेरी बस रहते हैं
दरशन कब दोगे कहते हैं
बस तेरी चाहत रखते हैं
मंगल करो अमंगलहारी गणपति देवा
भक्त तुम्हारे तुमसे मांगे सच्ची सेवा
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