तन्हा बैठा था एकदिन मैं अपने मकान में

by - January 17, 2020

तन्हा बैठा था एकदिन मैं अपने मकान में
चिड़िया बना रही थी घोंसला रोशनदान में
पलभर में आती पल भर में जाती थी वो
छोटे-छोटे तिनके चौच में भर लाती थी वो

वह बना रही थी अपना घर एक नियारा
कोई तिनका था ईट उसकी कोई था गारा
कड़ी मेहनत से घर जब उसका बन गया
आए खुशी के आंसू और सीना तन गया

मौसम बदला और हवा के झोंके आने लगे
नन्हे से प्यारे प्यारे दो बच्चे चहचाहने लगे
पाल पोस कर रही थी चिड़िया बड़ा उन्हें
पंख निकल रहे थे पैरों पर करती खड़ा उन्हें

इच्छुक इंसान कोई जमीन आसमान के लिए
कोशिश दोनों की एक ऊंची उड़ान के लिए
देखता था मैं उन्हें जज्बात उनसे जुड़ गए
पंख निकले बच्चे मां को छोड अकेले उड़ गए

चिड़िया से पूछा बच्चे अकेला क्यों छोड़ गए
तू थी मां उनकी फिर ये रिश्ता क्यों तोड़ गए
इंसान के बच्चे मां बाप का घर नहीं छोड़ते
जब तक मिले न हिस्सा रिश्ता नहीं तोड़ते

परिंदे और इंसान के बच्चे में यही फर्क है
इंसानका बच्चा मोहमाया के दरियामें गर्क है
इंसान का बच्चा पैदा होते ही हक जताता है
ना मिलनेपर मां-बाप को कचहरी ले जाता है


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