फिर मत कहना कुछ कर न सके
फिर मत कहना कुछ कर न सके
नहीं जीवन अब तक सवार सके
फिर मत कहना कुछ कर न सके
जब नर तन तुम्हें निरोग मिला
सत्संगति का भी योग मिला
फिर भी कृपा अनुभव करके
यदि भवसागर तुम ना कर सके
फिर मत कहना कुछ कर न सके
तुम सत्व तत्व ज्ञानी होकर
तुम सधरमी प्राणी होकर
यदि सरल निर्भमानी होकर
कामना विमुक्त विचर न सके
फिर मत कहना कुछ कर न सके
जग में जो कुछ भी पाओगे
सब यहीं छोड़ कर जाओगे
पछताओगे यदि तुम अपना
पुण्य से जीवन भर न सके
फिर मत कहना कुछ कर न सके
जब अंत समय आ जाएगा
तब क्या तुमसे बन पाएगा
यदि समय के रहते ही
आचार विचार सुधार न सके
फिर मत कहना कुछ कर न सके
नहीं जीवन अब तक सवार सके
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