बंसी लिए वह ब्रज का ग्वाला
तन का रंग था उसका काला
सूरत से था वो भोला भाला
रात को आया सपने में मेरे
बंसी लिए वह ब्रज का ग्वाला
बड़े - बड़े थे उसके वो नयना
गले में था पीताम्बर पहना
माथे पे मोर पंख वो सजाए
उसकी अदाओं का क्या कहना
सूरत से था वो भोला भाला
धीरे- धीरे पायल के नूपुर छनकाये
मधुर बांसुरी उसकी साथ में गुनगुनाए
देख उस मनमोहन की निराली चितवन
वन मयूरी जिया मेरा चहकचहक जाए
सूरत से था वो भोला भाला
सपना था मेरा ये खूबसूरत बड़ा
अधरों पे मुस्कान लिए बो था खड़ा
दिल में उतर गया वो कुछ इस तरह
नीले आसमां में जैसे चांद हो जड़ा
सूरत से था वह भोला भाला
तन का रंग था उसका काला
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